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मदर्स डे स्पेशल: मंगली ने नक्सली बेटे से कहा- घर लौट आ, अब आंखें बूढ़ी हो गई हैं, जी भर के तुझे देखना चाहती हूं; हथियार डाल डीआरजी में भर्ती हुआ, देश सेवा कर रहा है

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दंतेवाड़ा36 मिनट पहलेलेखक: लोकेश शर्मा

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मंगली अपने बेटे के लिए रोज गुहार लगाती है। इसका असर हुआ और 20 साल की उम्र में बमन लौट आए।

किसी शायर ने लिखा है, ‘कृत्यों ने मुझे काले बादल की तरह घेर लिया, जब कोई राह नजर नहीं आई तो मां आई।’ छत्तीसगढ़ में एक माँ ने कहा जब बेटा घर लौट आये। अब आंखें बूढ़ी हो गई हैं, जी भर के तुझे देखना चाहता हूं। इस पुकार ने असर दिखाया और बेटे ने नक्सलवाद की राह छोड़ हथियार डाल दिए। 5 साल तक नक्सलियों के लिए लड़ने वाला बामन, अब DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहा है।

यह कहानी है, दंतेवाड़ा जिले के नक्सलगढ़ कहे जाने वाले गढ़मिरी गांव की। यहां रहने वाली मंगली का 15 साल का बेटा बमन खेलने और पढ़ने की उम्र में नक्सली संगठन में शामिल हो गया है। उसके हाथों में हथियार थमा दिए गए। वह नक्सलियों की कटेकल्याण क्षेत्र कमेटी के बड़े नक्सली नेता कोसा, मंगतू, मर्करा, जगदीश के साथ काम करता है। वहीं मंगली अपने बेटे के लिए रोज गुहार लगाती है। इसका असर हुआ और 20 साल की उम्र में बमन लौट आए।

मंगली ने कहा- मेरा बेटा, मेरे बुढ़े की लाठी, लोन वर्राटू अभियान में किया सरेंडर
दंतेवाड़ा पुलिस, लोन वर्रातु (घर वापस आओ) अभियान चला रहा है। इस अभियान के तहत अब तक 350 नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। एसपी डॉ। अभिषेक पल्लव ने बताया कि नक्सली बामन पोड़ियन ने जनवरी 2021 में सरेंडर किया था। बामन अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। पिता खेती किसानी करते हैं। बामन की पत्नी और 2 छोटी बहनें भी हैं। घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर है। माँ मंगली कहती है, मेरा बेटा, मेरी उम्र की लाठी है।

सरेंडर किया तो नक्सलियों ने दी हत्या की सजा, अब तक गांव नहीं लौटे
बामन कभी नक्सल संगठन में रहकर DRG जवानों पर हमला करता था। अब खुद उसी टीम का हिस्सा है। अब वह काली नहीं, बल्कि खाकी वर्दी पहनता है। टीम के साथ नक्सल ऑपरेशन पर भी जाता है। बमन इंगित करता है कि जब सरेंडर किया था तब नक्सलियों ने मां को धमकी दी थी, कि वह मुझे मार डालेगा। सरेंडर करने के बाद अब तक गांव नहीं गया। उन्होंने कहा, जब नक्सल संगठन में तब एनकाउंटर का डर रहता था, पर अब देश सेवा कर रहा है।

बस्तर की बहुत सारी माँ समान दर्द और डर में जी रही हैं
बस्तर के बहुत सारे युवा भटक कर नक्सली संगठन का दाम थाम चुके हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जिन्हें बचपन में ही नक्सली जबरदस्ती पकड़ कर ले गए। कई डर के कारण नक्सली संगठन का हिस्सा हैं, लेकिन ये सबके पीछे इनकी माताएं हैं। जो दर्द और डर के साए में जीती हैं। खंडित में जब नक्सली मारे जाते हैं, तो इनकी माँ का दिल भी बहुत रोता है। हालांकि बहुत ऐसे भी हैं, जो अपने परिवार या प्यार के लिए नक्सल की राह को अलविदा कह चुके हैं।

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