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परिस्थितियों में सीखता है दो कहानियाँ: लॉकडाउन ने रोजगार छीना तो सार्थक शवास के अंतिम संस्कार को बनाया उद्देश्य; एसडीएम कार्यालय बंद हुआ तो स्कूटी पर बैठ डेथ सर्टिफिकेट बनाने लगा पटवारी

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गरियाया हुआ10 मिनट पहले

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मनीष कहते हैं कि उन्हें पता है कि यह जोखिम भरा है, लेकिन पीपीई किट पहनकर कोविड गाइडलाइन का पूरा पालन करते हैं। यह उन्हें नैतिक और सामाजिक दायित्व लगता है।

छत्तीसगढ़ में स्थित और मृत्यु के आंकड़े बढ़ने लगे हैं। तमाम ऐसे लोग हैं, जो अपनों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहे। ऐसे में गरियाबंद के दो युवा फरिश्ता बन गए हैं। लॉकडाउन ने रोजगार छीना तो चेतों की सेवा को ही मकसद बना लिया। जिन शवों को परिजन हाथ नहीं डालते, उन्हें भी मुक्तिधाम पहुंचता है। वहीं एसडीएम ऑफिस बंद होने के बाद एक पटवारी स्कूटी पर ही बैठकर डेथ सर्टिफिकेट बनाने लगा।

जब कोई भिन्नता शव को नहीं छूती है, तो मनीष हाथ बढ़ाते हैं
गरियाबंद नगर के रहने वाले मनीष यादव लगभग 12 दिनों से जिला अस्पताल में टाइपों की सेवा में जुटे हैं। कई दिनों में 30 शवों को एर्केन से मुक्तिधाम ले जा चुके हैं। इन 15 शव ऐसे भी थे, जिन्हें छूने के लिए परिजन तक तैयार नहीं थे। वहाँ 7 शकों का स्वयं अंतिम संस्कार किया। इनमें से 3 के परिजन नहीं आए, बाकी के पहुंचे तो मुखाग्नि देने की हिम्मत ही नहीं जुटा सकी। उनके इस काम में दो कर्मचारी कोपरा के ताराचंद और फिंगेश्वर के विक्रम सहयोगी हैं।

मनीष बताते हैं कि लोगों में इतना डर ​​है कि कोई शव उठाने वाला नहीं है।  परिजन तक कई बार आने वाले को तैयार नहीं होते हैं।

मनीष बताते हैं कि लोगों में इतना डर ​​है कि कोई शव उठाने वाला नहीं है। परिजन तक कई बार आने वाले को तैयार नहीं होते हैं।

शादी में साइकिल पर लाउडस्पीकर बजाते थे, लॉकडाउन में बंद हो गया काम
मनीष गाँव-गाँव गो शादियों में साइकिल पर लाउडस्पीकर रख कर गाना बजाते थे। लॉकडाउन में काम बंद हो गया। इसी दौरान उन्हें अस्पताल में काम करने वाले एक युवक ने बताया कि हानिकारक रोगियों की मौत के बाद शवों को मोर्चरी में रखने और एकर्न्स तक ले जाने वालों की कमी है। काम जोखिम का है, इसलिए कोई तैयार नहीं हो रहा है। तब मानुष आगे और उन्होंने इसे अपने हाथ में ले लिया। खास बात यह है कि यह सारा काम वो बिना पैसों के कर रहे हैं।

मनीष कहते हैं- यह काम नैतिक और सामाजिक दायित्व लगता है
मनीष बताते हैं कि लोगों में इतना डर ​​है कि कोई शव उठाने वाला नहीं है। परिजन तक कई बार आने वाले को तैयार नहीं होते हैं। जो आते भी हैं, वह दूरी बनाकर रखते हैं। मोर्चुरी से शव को वाहन में रखने, मुक्तिधाम ले जाने और अंतिम संस्कार तक पूरा काम हम तीनों ही करते हैं। कहते हैं कि उन्हें पता है कि यह जोखिम भरा है, लेकिन पीपीई किट पहनकर कोविड गाइडलाइन का पूरा पालन करते हैं। यह उन्हें नैतिक और सामाजिक दायित्व लगता है।

अस्पताल में वार्ड ब्वाय नहीं होने और जोखिम के बाद भी मनीष ने इस काम को अपने हाथ में ले लिया।  खास बात यह है कि यह सारा काम वो बिना पैसों के कर रहे हैं।

अस्पताल में वार्ड ब्वाय नहीं होने और जोखिम के बाद भी मनीष ने इस काम को अपने हाथ में ले लिया। खास बात यह है कि यह सारा काम वो बिना पैसों के कर रहे हैं।

स्कूटी में ही डेथ सर्टिफिकेट बनाने की व्यवस्था, प्रोफाम से लेकर मुहर तक
वहीं पटवारी मनोज कंवर की कोविड में ड्यूटी लगाई गई है। उन्होंने इसे समाजसेवा बना लिया है। ईमानदार की मौत के बाद शव के अंतिम संस्कार के लिए डेथ सर्टिफिकेट जरूरी होता है। ऐसे में मनोज ने उसका प्रोफेशन बना लिया है। उसे वे अपनी स्कूटी में ही मुहर के साथ रखे रहते हैं। सर्टिफिकेट के लिए फार्म भरकर वॉट्सऐप पर एसडीएम को भेज देते हैं। वहाँ से साइन होने के बाद अस्पताल या फिर तहसील कार्यालय जाकर भारी कॉपी परिजनों को सौंपते हैं।

परिजनों को शव सौंपने के बारे में अंतिम संस्कार तक की करते हैं व्यवस्था
कई बार जब परिजन नहीं आते तो मनोज ही नैतिक जिम्मेदारी उठाते हुए अंत्येष्टि की पूरी व्यवस्था करते हैं। अब तक परिजनों के नहीं आने पर 3 से ज्यादा शव का अंतिम संस्कार भी करा चुके हैं। इसके लिए पूरे खर्च वह खुद उठाते हैं। इस बीच मनोज ने एक बार खुद भी पॉजिटिव हो चुके हैं। इसके बाद भी वह ठीक हो गया फिर अस्पताल पहुंच गए। अंतिम संस्कार की व्यवस्था से लेकर परिजनों को समस्या ना हो इसका पूर्वा ध्यान रखें।

जब परिजन नहीं आते तो मनोज ही नैतिक जिम्मेदारी उठाते हुए अंत्येष्टि की पूरी व्यवस्था करते हैं।  अब तक परिजनों के नहीं आने पर 3 से ज्यादा शव का अंतिम संस्कार भी करा चुके हैं।

जब परिजन नहीं आते तो मनोज ही नैतिक जिम्मेदारी उठाते हुए अंत्येष्टि की पूरी व्यवस्था करते हैं। अब तक परिजनों के नहीं आने पर 3 से ज्यादा शव का अंतिम संस्कार भी करा चुके हैं।

कोरोना परिस्थितिकाल में परिजन भी शव के पास जाने से डरते हैं। ऐसे कठिन समय में भी मनीष यादव सच्चे समाज सेवी के रूप में इस जोखिम भरे काम को करने के लिए तैयार हुए हैं। मनीष को शासन प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन की ओर से हर संभव सहयोग प्रदान किया जाएगा।
-डॉ। जी एल टंडन, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल

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