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धर्म समाज: सिखों के 9 वें गुरु तेगबद का 400 वां प्रकाश पर्व, गुरुद्वारों में हुई अरदास, 2000 से जुड़ी संगत

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बिलपुर14 मिनट पहले

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दयालबंद गुरुद्वारा में हजूरी रागी जत्था ने ऑफ़लाइन शबद-कीर्तन की पंजीकरण दी।

  • कीर्तन किया गया, साथ ही संगत को बताया गया कि गुरु तेग बहादुर ने धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों की रक्षा के लिए कहा कि वे अपने प्राण की आहुति दी थी।

गुरु तेग बहादुर सिंह सिख समुदाय के नौवें गुरु हैं। शनिवार को उनका 400 वां प्रकाश पर्व मनाया गया। इस उपलक्ष्य में दयालबंद स्थित गुरुद्वारा में सुबह 10 बजे से 11.15 बजे तक विशेष दीवान सजा। सभी के भले के लिए अरदास की गई। कीर्तन हुआ। जिसका आनंद संगत ने ऑफलाइन लिया।

गुरु तेग बहादुर सिंह के 400 वं प्रकाश पर्व को समाज द्वारा धूमधाम से मनाया जाना था। शोभायात्रा प्रदेशभर में निकलनी थी, जो गुरु तेग बहादुर सिंह के कार्यों के बारे में लोगों को बताती है। संक्रमण के चलते समाज द्वारा इन सभी कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया।

समाज द्वारा इस परिस्थिति के घड़ी में सेवा कार्य में लगे हुए हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर से लेकर भोजन, सूखा राशन, दवा, फेस, सेनेटाइजर सहित अन्य जरूरत की सामग्री पहुंच रही हैं। दयालबंद गुरुद्वारा में जत्थों द्वारा संगत को बताया कि गुरु तेग बहादुर ने धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांत की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राण की आहुति दी थी। सिख धर्म में उनके बलिदान को बड़ी ही श्रद्धा से याद किया जाता है।

युद्ध में चित्रुरी की वजह से तेजग के नाम से प्रसिद्ध हो गए हैं

  • औरंगजेब ने कश्मीर में हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बनाने के सख्त सख्त होने और खुद भी इस्लाम कबूलने से मनाया। औरंगजेब के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई।
  • पिता ने उन्हें त्यागगम नाम दिया था, लेकिन मुगलों के खिलाफ युद्ध में हमुरी की वजह से वे तेग बहादुर के नाम से मशहूर हुए। तेग बग का मतलब होता है तलवार का धनी।
  • दिल्ली का प्रसिद्ध गुरुद्वारा शीश गंज साहिब जहां है, उसी स्थान पर उनकी हत्या की गई थी और उनकी अंतिम विदाई भी यहीं से हुई थी, वह जगह आज रकाबगंज साहिब के नाम से होनी चाहिए।
  • वर्ष 1665 में उन्होंने आनंदपुर साहिब शहर बनाया और बसाया। वह गुरुबानी, धर्म ग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों और पुवारी में भी प्रवीण थे।
  • उन्होंने 115 शबद भी लिखा, जो अब पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा हैं।

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