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यह गलत है, ऐसा किसी के साथ न हो: रायपुर एम्स ने शाम को रोगी के बेटे से कहा- आपके पिता की मौत हो गई, सुबह पता चला कि वे जिंदा हैं, अब आया कॉल- वे नहीं आ रहे थे

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रायपुर28 मिनट पहले

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तस्वीर एम्स के मर्चुरी की है। काफी इंतजार के बाद मरीज का शव उनके परिजनों को यहां सौंप दिया गया।

रायपुर के मोहबा बाजार इलाके में रहने वाले एक परिवार के साथ जो हुआ, वो जनता की सुरक्षा का जिम्मा लेने वालों के साथ हो तो शायद लोगों की तकलीफ उन्हें समझ में आ गई। को विभाजित योग्य रोगी सतीश गुरवेकर के पुत्र स्वराज को शुक्रवार की शाम ने बताया कि उनके पिता का निधन हो गया है। सुबह आकर शव ले जाने की प्रक्रिया कर लें। पूरी रात परिवार रोता रहा, हर जानने वाले को खबर मिली तो सभी शोक में डूब गए।

जब बेटे ने एम्स की मर्चुरी से शनिवार की सुबह शव लेने के लिए संपर्क किया तो वहां उनके पिता का शव नहीं था। उस मानसिक दशा को महसूस करिए कि बेटा इसके बाद अपने पिता का शव ढूंढने की कोशिश में लगा रहा। बार-बार पूछने पर उसे पता चला कि उसके पिता जिंदा हैं, वेंटिलेटर पर हैं। ये खबर उसने परिवार के लोगों को बताई। लेकिन यह राहत कुछ ही घंटों की रही। शनिवार की दोपहर फिर से बेटे को एम्स की तरफ से जानकारी दी गई कि उनके पिता का निधन हो चुका है।

ये मानवीय डिफ़ॉल्ट नहीं, बड़ी लापरवाही है

16 अप्रैल की रात से लेकर 17 अप्रैल की दोपहर तक इस परिवार ने जो झेला वो शब्दों में लिखना पाना संभव नहीं है। जहां बिना नाम पता और पूरी जानकारी के, मेडिकल रिपोर्ट के लोग प्रवेश नहीं कर सकते वहाँ रोगी को इस तरह की लापरवाही का खुलासा होना कोई मामूली बात नहीं है। एम्स प्रबंधन हमेशा को विभाजित प्रोटोकॉल का पालन करने और रोगी को बेहतर सुविधा मुहैया कराने के दावे करता है। लेकिन इस घटना के रोगियों के प्रबंधन को लेकर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। इस पूरे वाकया झेलने वाले मृत रोगी के बेटे ने इलाज के दौरान झेली गई जिन तक दोषों का दैनिक भास्कर से जिक्र किया वो और भी झकझोर देने वाली हैं। उसी के शब्दों में …

रायपुर एम्स के इसी ब्लॉक में स्वराज के पिता एडमिट थे।

रायपुर एम्स के इसी ब्लॉक में स्वराज के पिता एडमिट थे।

मेरे पिता को यूरिन बैग तक नहीं दिया, डॉ। बोले- पानी की बोतल काट लो

सतीश गुरवेकर को कोरोना से पीड़ित होने की वजह से एम्स में भर्ती करवाया गया। उनकी हालत लगातार खराब हो रही थी तो आईसीयू में रखा गया था। बेटे स्वराज ने बताया कि वे इस कदर कमजोर हो चुके थे कि पेशाब के लिए वाशरूम तक नहीं जा रहे थे। मैंने एक दो बार उन्हें सहारा देकर ले जाने की कोशिश की। मैंने डॉ से कहा था कि एक यूरिन बैग दे चलो, मुझे जवाब मिला कि यूरिन बैग नहीं है कोई बॉटल कट कर यूज कर रहा है।

गिर जाते थे, कोई उठाने वाला नहीं था

स्वराज ने कहा- पापा के हाथ और पीठ में चोटें लग गई थीं, मैंने पता किया तो जानकारी मिली कि वो बिस्तर से उठने की कोशिश करते हैं तो गिर जाते थे। उन्हें कोई उठाने वाला नहीं था। पूरी रात वो बिस्तर से नीचे गिरे पड़े हुए थे, मुझे ये भी पता चला। मैं मजबूर भी था और अंदर से बेहद उग्र में भी। मैंने डॉक्टर्स से पूछा कि क्यों उन्हें प्रॉपर कैर नहीं दिया जा रहा है तो कह दिया गया कि यहां बहुत लोग हैं, जो-जो को देखें।

रविवार को हुआ अंतिम संस्कार

इस दर्द को झेलने वाले गुरवेकर परिवार के पास अब अपने परिवार के मुखिया को चुनने के गम के सिवा कुछ नहीं है। रविवार को स्वराज ने बताया कि सुबह काफी देर तक इंतजार के बाद पापा की पार्थिव देह मिली, कोविड प्रोटोकॉल के साथ हम उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं, मेरे पापा के साथ जो हुआ बहुत गलत हुआ।

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