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मृत्यु की राजधानी: बेटा बोला-जिंदा जल गए मेरे पिता, ये चुनने वाले अस्पताल वालों ने पेमेंट के लिए किया फोन; दूसरे युवक ने कहा-दूसरों के बीच अपना भाई ढूंढकर आ रहा हूं

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रायपुर22 मिनट पहले

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तस्वीर रायपुर की है। युवती के पिता ईश्वर राव को लेकर प्रशासन ने कहा कि दमने से उनकी मौत हुई, लेकिन अस्पताल में उनका जला हुआ शव घंटों तक गिरता रहा।

रायपुर शहर की राजधानी हॉस्पटल में आग लगाने में 5 लोगों की मौत हो गई। हादसे में मरने वालों के परिजन को सरकार ने 4 लाख रुपए देने का एलान किया है। शनिवार को दोपहर लगभग 2 से 3 बजे के बीच ये घटना हुई। अस्पताल में दो दर्जन से अधिक कोरोना मरीज भरे हुए थे। आग लगने की वजह से किसी का दम घुट गया तो कोई कोविड से इतना कमजोर हो गया था कि अपने बिस्तर से उठकर भाग भी नंगे हो। कुछ मरीज तो जिंदा ही जल गए। मृतकों के परिजनों ने दैनिक भास्कर को अपनी जिंदगी की इस बड़ी त्रासदी के बारे में जो कुछ बताया है उन्हीं के शब्दों में।

हम पेमेंट के लिए एटीएम खोज रहे थे, इधर मेरे पिता जिंदा जल रहे थे
इश्वर राव नाम के मरीज भिलाई से इस अस्पताल में इलाज के लिए आए थे। उरणके बेटे दिल्ली राव ने बताया कि मैं आज अपनी, माँ, बहन को लेकर एम्स गया था। हम खुद का कोविड टेस्ट करवा रहे थे, तब दोपहर तक लगभग 2 बजे आस-पास अस्पताल वालों ने फोन किया कि पेमेंट करना है। इस वक्त अस्पताल में आग लगने लगी थी, मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा। दिल्ली की बहन ने बताया कि हम एटीएम खोज रहे थे, कि कहीं से पैसे लाकर अस्पताल वालों को दें, ताकि मेरे पापा की अच्छी देख-रेख हो। लेकिन तब तक तो वो जल चुके थे।

तस्वीर रायपुर के राजधानी अस्पताल की जहां ये हादसा हुआ।

तस्वीर रायपुर के राजधानी अस्पताल की जहां ये हादसा हुआ।

5 घंटे चीखते रहे- अरे बेटा तो दे दो
दिल्ली ने बताया कि हम अस्पताल के सामने एकर्न्स और फायर ब्रिगेड की गाड़ी देखकर डर गए। कोई कुछ नहीं बता रहा था अस्पताल वाले बात करने को राजी नहीं थे। मैंने कुछ नहीं सुना और ऊपर जाना देखा, बिस्तर पर मेरे पिता जले हुए थे। मैंने अपने हाथ से उनके चेहरे पर कपड़ा दिया तो देखा उनकी डेथ हो चुकी थी। दिल्ली की मां ने बताया कि हम 5 घंटे तक चींखते रहे कि कोई उन्हें बाहर निकाल दो, अरे लाश तो दे दो मगर मगर अस्पताल वालों ने कुछ नहीं सुना, यूं ही हमें छोड़ दिया। पुलिस वालों ने कहा था कि सुबह पंचनामे के बाद प्रत्येक दी जाएगी।

बेबसी के आंसू थम नहीं रहे थे, अपनों की इलाज में जिस अस्पताल में आए वहां आग ने उम्मीदों को खाक कर दिया।

बेबसी के आंसू थम नहीं रहे थे, अपनों की इलाज में जिस अस्पताल में आए वहाँ आग ने उम्मीदों को खाक कर दिया।

अंदर जंगें ही लाशें थी सर, बड़े भाई का अधजला शव पड़ा है
कवर्धा से आए प्रिय प्रकाश ने बताया कि मेरे बड़े रमेश साहू इस अस्पताल में 9 दिनों से एडमिट थे। मैं दिन भर उनके साथ था। लगभग पौने दो बजे मैं दवाएँ वगैहर लाकर देने के बाद रूम पर चला गया। पहुँचा तो लगभग 15 मिनट बाद मुझे कॉल आया कि यहाँ आग लग गई है। मैं हड़बड़ाकर यहाँ पहुँच गया। कोई कुछ जानकारी ही नहीं दे रहा था। मेरे पेशेंट को निकालने की मिन्नतें कर रही थी लेकिन किसी ने नहीं सुना। मैं जैसे-तैसे अंदर गया तो देखा कई रोजें पड़ी थीं, मैं गिन नहीं पाया मगर जो लोग हटाकर ले जा चुके थे, वे ले गए थे। अब भी वहाँ हैं पेंड हैं। अस्पताल का स्टाफ एक घंटे तक मुझे घुमाता रहा, मैं पूछता रहा मेरे भइया कहां है, मुझे जवाब मिला अरे रुक जाओ यार अभी हम बिजी हैं, कहीं इधर-उधर हो गए होंगे। शवों के बीच मैंने देखा तो मेरे बड़े भाई की आधी जली लाश पड़ी थी। वे ही मेरे भाई थे।

अस्पताल के पिछले हिस्से की पार्किंग में कुछ मरीजों को कुर्सी पर बैठाकर ऑक्सीजन दी गई।

अस्पताल के पिछले हिस्से की पार्किंग में कुछ मरीजों को कुर्सी पर बैठाकर ऑक्सीजन दी गई।

लोग चींखते हुए एर्केन ले आओ- मरीजों को सही जगह पर पहुंचे
अस्पताल में जिस वक्त हादसा हुआ यहां 50 के करीब मरीज थे। ऊपरी इमारत का कांच तोड़कर धुआँ बाहर निकाला गया। मरीजों के परिजन खुद अपने जोखिम पर मरीजों को बाहर निकालने की व्यवस्था कर रहे थे। कुछ लोग चीख रहे थे, रो रहे थे बस अस्पताल के कर्मचारी से यही कह रहे थे कि मेरे मरीज को बाहर निकाल दो, लेकिन उन्हें सही जगह पर पहुँचा दो। अस्पताल के बाहर स्टाफ और मरीज के घर वालों ने कुछ एकर्न्स बुलवाईं।

कुछ मरीजों की किस्मत अच्छी थी।

कुछ मरीजों की किस्मत अच्छी थी।

यहाँ जिसे जो समझ आ रहा था वह कर रहा था। कुछ लोगों ने अपने मरीज को भेजा है। कुछ लोगों के मरीज रात 9 बजे तक अस्पताल में ही फंसे रहे। दैनिक भास्कर रिपोर्टर ने अस्पताल में काम करने वाले एक कर्मचारी से पूछा कि मरीजों को कहां भेजा जा रहा है। उसने जवाब दिया तहसीलदार सर से पूछी। रात के वक्त यहां कलेक्टर भारतीदासन और एसएसपी अजय यादव हालात का जायजा लेने पहुंचे अब जरूरत के हिसाब से बाकि बचे मरीजों को प्राथमिक या सरकारी को विभाजित केंद्र में शिफ्ट किया जा रहा है।

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