Harshit India news

breaking news | Bhopal local news | Madhya Pradesh news | Indore news

प्राप्त करें, नक्सलियों से रणों को मुक्त कराने वाले ‘ताऊजी’ से: विनोबा भावे से 5 रुपए बारे बस्तर आए थे, यहां शांति कायम हो इसलिए 37 आश्रमों में मुफ्त देते हैं बेटियों को शिक्षा

विज्ञापन से परेशान है? बिना विज्ञापन खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

रायपुर(*37*)32 मिनट पहले(*37*)लेखक: सुमन पांडेय(*37*)

  • कॉपी लिस्ट(*37*)

तस्वीर में नजर आ रहे बस्तर के 92 साल के सैनी बस्तर में ताऊ जी नाम से प्रसिद्ध हैं। शानो की रिहाई के लिए उन्होंने सरकार और नक्सलियों के बीच मध्यस्तता की।(*37*)

बीजापुर में 3 अप्रैल को सीआरपीएफ और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई। 22 युवा शहीद हुए थे और कोबराण्डो राकेश्वर सिंह को नक्सलियों ने अगवा कर लिया था। 5 दिन के बादांडो की रिहाई हुई। शानो के साथ मुस्कुराते हुए एक बुजुर्ग की तस्वीर सामने आई। ये धरमपाल सैनी हैं। 92 साल के सैनी बस्तर में ताऊ जी नाम से प्रसिद्ध हैं। शानो की रिहाई के लिए उन्होंने सरकार और नक्सलियों के बीच मध्यस्तता की। धरमपाल सैनी के बस्तर आने और फिर यहीं के साथ रहना जाने की कहानी बेहद दिलचस्प है। जानिए आखिर कौन हैंंदो की रिहाई करवाने वाले बस्तर के ये ‘ताऊ जी’।

फार्म मध्यप्रदेश के धार जिले के रहने वाले धरमपाल सैनी विनोबा भावे के चेल रहे हैं। 60 के दशक में सैनी ने पत्र में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़ी थी। उस खबर में लिखा था कि दशहरे के मेले से लौटते हुए कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़कों ने छेड़छाड़ की। लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काटकर उनकी हत्या कर दी थी। सैनी ये खबर देखकर सोच में पड़ गई। उन्होंने सोचा कि बस्तर जाना यहाँ की बेटियों को सही दिशा देनी होगी। कुछ वर्षों बाद उन्होंने अपने गुरु विनोबा भावे से बस्तर आने की अनुमति मांगी। भावे ने उन्हें 5 रुपए का एक नोट थमाया और इस शर्त के साथ अनुमति दी कि वे कम से कम दस साल बस्तर में ही चले जाएंगे।

रणो राकेश्वर के साथ धरमपाल सैनी।  तस्वीर बीजापुर के उस गांव की जहां नक्सलियों ने जवान को रिहा किया।

रणो राकेश्वर के साथ धरमपाल सैनी। तस्वीर बीजापुर के उस गांव की जहां नक्सलियों ने जवान को रिहा किया।(*37*)

वर्ष 1976 में सैनी बस्तर आए और फिर यहीं के साथ रह गए। आगरा यूनिवर्सिटी से कॉमर्स-सैनी खुद भी चिल्ल रहे हैं। जब वे बस्तर आए तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से पैदल चल रहे हैं। बच्चों के इस स्टेमिना को खेल और शिक्षा में यूज करने का प्लान उन्होंने तैयार किया। 1985 में पहली बार उनके आश्रम की छात्राओं ने स्पोर्ट्स कंपिटिशन में उतारा। इसके बाद हजारों बेटिया बालिकाओं को उन्होंने खेल से जोड़ा दिया। बालिका शिक्षा में बेहतर योगदान के लिए 1992 में सैनी को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। 2012 में ‘द वीक’ मैगजीन ने सैनी को मैन ऑफ द इयर चुना था।

सैनी अपने आश्रमों में बच्चों को सकारात्मक तरीके से हर वो चीज सीखने की कोशिश करते हैं जो उनकी जिंदगी में काम आए।

सैनी अपने आश्रमों में बच्चों को सकारात्मक तरीके से हर वो चीज सीखने की कोशिश करते हैं जो उनकी जिंदगी में काम आए।(*37*)

(*5*)

हर साल इसी तरह आश्रम में पढ़ने वाली बच्चियों के खेल और दूसरी एक्टिविटी में अवॉर्ड पाती हैं।(*37*)

बेटियों को शिक्षित करते हैं सैनी
गांधीवादी विचारों और आदर्शों को मानने वाले सैनी बस्तर संभाग में 37 आश्रम चलाते हैं। ये एक तरह के हॉस्टल होते हैं, यहां रहकर आदिवासी बच्चों की पढ़ाई करते हैं। सैनी के आने से पहले तक बस्तर में साक्षरता का ग्राफ 10 प्रतिशत भी नहीं था। आज यह 50 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। सैनी के बस्तर आने से पहले तक आदिवासी लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं। आज सैनी की स्टूडेंट्स बस्तर में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर रहे हैं।

फिजिकल ट्रेनिंग भी ताऊ जी खुद ही देते हैं।

फिजिकल ट्रेनिंग भी ताऊ जी खुद ही देते हैं।(*37*)

सैनी के आश्रम में बने बच्चों के लिए अलग-अलग खेल प्रतियोगिताओं में दर्जनों अवॉर्ड मिल चुके हैं। अब हर साल 100 स्टूडेंट्स अलग-अलग इवेंट में अपना परचम लहराती हैं। अब तक आश्रम की 2300 स्टूडेंट्स अलग-अलग स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा ले चुके हैं। डेमरापाल स्थित आश्रम में हजारों की संख्या में मेडल्स और ट्रॉफियां रखी हुई हैं। आश्रम की छात्राओं को अब तक खेल में ईनाम के रूप में 30 लाख से ज्यादा की राशि जीत चुके हैं। खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, उनकी डाइट और अन्य जरूरतों का ख्याल सैनी खुद रखते हैं। बालिका शिक्षा में बेहतर योगदान के लिए 1992 में सैनी को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।

बस्तर के बहुत से आदिवासी परिवार सैनी का बेहद अच्छा करते हैं।

बस्तर के बहुत से आदिवासी परिवार सैनी का बेहद अच्छा करते हैं।(*37*)

वार्ता के लिए इस कारण से चुना ताऊ जी को चुना गया
पुलिस अपने इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट सेांडो राकेश्वर को रिहा करवाने को लेकर हर तरह की कोशिश कर रही थी। अफसरों को इनपुट मिला कि नक्सली किसी निर्दोष आदमी से बातचीत के बाद संतो को रिहा कर सकते हैं। सैनी 1976 से बस्तर को देख रहे हैं। यहां के नक्सल प्रभावित गांवों में वे शिक्षा को लेकर काम कर रहे हैं। ऐसे में वे एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। पुलिस ने धरमपाल सैनी से बात की। सैनी खुद भी कई मौकों पर नक्सलियों से वार्ताकार बस्तर में शांति की कोशिश करने की इच्छा जाहिर कर रहे थे। इसके बाद उनके साथी जय रुद्र करे, आदिवासी समाज के बौरैय तेलम, सुकती हक्का और 7 पत्रकारों की टीम नक्सलियों से वार्ता के लिए भेजी गई थी।

खबरें और भी हैं …(*37*)

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: