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अलग खबर: यहां किसी के भी घर में बिजली के काम के लिए बुलाते हैं ‘कलेक्टर’ या ‘पुलिस’ को

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कोंडागांव4 मिनट पहलेलेखक: विजय शर्मा

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  • पिता का नाम सूबेदार और पांच बेटों के नाम कलेक्टर, पुलिस, दरोगा, वकील और जज, सबके सब बिजली के मैकेनिक

आपने कभी किसी का नाम कलेक्टर, पुलिस, वकील ये सब सुना है …। नहीं न..लेकिन एक परिवार में सबके ऐसे ही नाम हैं। पिता का नाम सूबेदार सिंह। उसके पांच बेटे हैं। पांचों बेटों का नाम कलेक्टर सिंह, पुलिस सिंह, दरोगा सिंह, वकील सिंह और जज सिंह है। परिवार के सभी सदस्य बिजली मैकेनिक हैं। ये परिवार कोंडागांव से दो किलोमीटर दूर कुम्हरपारा में रहता है।

मूलत: बिहार के हैं, लेकिन पिछले 25 वर्षों से यहीं रहते हैं। सूबेदार के बेटे कलेक्टर सिंह ने बताया कि घर में कोई भी बच्चा जीवित नहीं बचा था। नामकरण के बाद उसकी मौत हो जाती है। पिता सूबेदार ने फिर बच्चों का नामकरण करना बंद कर दिया।

उसके अपने पूर्वजों से सुना था कि अजीबोगरीब नाम रखने से बच्चे बच जाते हैं। लोग इसे कुछ भी कहें, उसने अपने बच्चों के नाम प्रशासनिक पदों के हिसाब से रख दिए। अब इस गांव के किसी भी बड़े अादमी के घर बिजली का कोई काम होता है, तो वे सीधे कहते हैं, जाओ कलेक्टर या पुलिस को बुलाओ।

गांवों में आज भी जीवित परंपरा है

वास्तव में आज भी यह परंपरा गांवों में जीवित है। मान्यता है कि जब परिवार मेँ किसी को भी कारण से लगातार बच्चों की मौतें होती हैं तो बच्चे को एक घर से दूसरे घर में बेचा जाता है या उन बच्चों का नाम ऐसा रखा जाता है जो बोलने सुनने में अजीब हो। इसके अलावा बेचने की परंपरा केवल दिखावा या डेमो की तरह होती है। मान्यता यह भी है कि ऐसा करने से बच्चों की उम्र लम्बी हो जाती है।

संकल्प ही समाधान

ऐसा पहले होता था कि लोग झाड़ूराम, कचोगाई और इस तरह के नाम रखते थे ताकि उम्र बढ़ जाए। इसका लॉजिक ये होता था कि नज़र लगने से मौत हो जाती है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, पुराने जने में चिकित्सा की उतनी सुविधा नहीं थी। बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा थी। पीड़ित की महिलाओं की मृत्युदर ज्यादा थी। उपलब्ध पहले घरों में भी हुआ था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। छोटे-छोटे गाँवों में भी अच्छे अस्पताल हैं। इसलिए इस धारणा को बदलना चाहिए कि कुछ भी नाम रखने से बच्चों की उम्र बढ़ जाती है। नाम रखना बेहद निजी मसाला है। यदि माता पिता शौक से अपने बच्चों का नाम कुछ रखते हैं तो यह उनका व्यक्तिगत अधिकार है। किन्तु समाज में यदि कुछ गलत धारणा बन रही है, तो उसे तोड़ा जाना चाहिए। -डॉ। दिनेश मिश्र, अध्यक्ष, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति

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