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नक्सली हमले पर छ्त्तीसगढ़ के DGP का इंटरव्यू: हमने जंगल में 80 कैंप बनाए, हमला इसी बौखलाहट में, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नक्सली मजबूत हो रहे हैं

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  • हमने 80 कैंपों को जंगल में बनाया; एक ही रोष में नक्सली हमला, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सुरक्षा बल कमजोर हो रहे हैं, नक्सली मजबूत हो रहे हैं।

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नई दिल्लीएक घंटा पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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बीजापुर में हुए नक्सली हमले में 24 जवान शहीद हुए हैं। इस हमले के बाद फिर नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन और सुरक्षाबलों की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। बार-बार ऐसी प्रविष्टियां से हम लोग क्यों नहीं लेते हैं? क्या सुरक्षाबलों को अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है या नक्सलवाद एक बार फिर सिर उठा रहा है। छत्तीसगढ़ के DGP डीएम अवस्थी के सामने दैनिक भास्कर ने कुछ ऐसे ही सवाल रखे। पेश हैं इस बातचीत के कुछ खास अंश …

युवा फिर नक्सली हमले का शिकार हुए हैं, क्या हम पहले के हमलों से सबक नहीं लेते हैं?
हर नक्सली हमले के बाद समीक्षा होती है। बात फ़ोन लेने या डिफ़ॉल्ट होने की नहीं है। अंदर जो नक्सलियों का क्षेत्र है, वहां जंगल इतने घने हैं कि हमले की आशंका तो हमेशा रहती है। यह इलाका नक्सलियों का बिल्कुल जाना पहचाना है। वे उस इलाके में घुसे हुए हैं। छिपने की जगह उन्हें पता है। ज्यादातर मामलों में नक्सली ऊंचाई पर होते हैं और सुरक्षाबल नीचे होते हैं। इसलिए आप जैसा चाहे चाकचौबंद रणनीति बना लें, हमला का जोखिम तो बना ही रहेगा।

हां, हमने अपनी रणनीति के तहत यह तय किया है कि गांव के भीतर सेना नहीं जाएगी। हालांकि, कुछेक मीडिया रिपोर्ट कह रही है कि इस बार युवा गांव के भीतर या लगभग चले गए थे। अपने दंडरों के साथ समीक्षा करने के बाद ही हम कह सकते हैं कि ऐसा हुआ या नहीं, लेकिन इस तरह के ऑपरेशन जब भी होंगे तो ऐसे प्रदर्शन का जोखिम बना रहेगा।

गांव वालों और केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के संबंध कैसे हैं?
गांव वाले सुरक्षाबलों पर अब भरोसा करने लगे हैं। इसका प्रमाण है CRPF के कैंपों का काफी अंदर तक होना। जहां-जहां सुरक्षाबल पहुंच जाते हैं, वहां विकास कार्य भी होते हैं। नक्सली क्षेत्रों में तैनात सुरक्षाबल अपनी तरफ से लगातार गांव वालों से अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करते हैं। गांव काफी घने जंगलों के बीच होते हैं, इसलिए चिकित्सा सुविधा उन्हें मुश्किल से मिल पाती है। हम लोग कई बार कुछेक अश्लील और बातों या किसी बीमार व्यक्ति को अपने हेलिकॉप्टर से अस्पताल तक ले गए। गांववालों के बीच अब फोर्स की मददगार वाली छवि बनी हुई है। कोरोना के दौरान हमने गांवों तक राशन और मेडिकल सुविधाएं पहुंचाने का काम किया।

2015 में सरकार ने कृषि के क्षेत्रों के विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए प्रगति परियोजना शुरू की थी, क्या नक्सली क्षेत्रों में विकास हुआ?
हां, काफी विकास हुआ है। नए स्कूल, भवन, सड़कें बनी हुई हैं। बरसों से जिन इलाकों में नक्सलियों का कब्जा था, वहां सड़क बन गई है, लेकिन दिक्कत यह है कि ये लोग हर बार सड़क और स्कूल को बम से उड़ा देते हैं। ताजा एंट नक्सल ऑपरेशन से कुछ दिन पहले ही मुठभेड़ वाली जगह पर सड़क का काफी बड़ा क्षेत्र इन लोगों ने काट दिया था, लेकिन हम लगातार नए कैंप लगा रहे हैं।

तर्रेम जहाँ पर यह मुठभेड़ हुई, वहाँ भी हाल ही में कैंप बनाया गया था। इसके आगे एक सिलगर जगह है, वहाँ भी नया कैंप बन रहा है। ऐसे कई नए कैंप बनाए गए। 2016 से 2021 तक हमने 80 से ज्यादा नए कैंप खोले हैं। लगातार हम अपने कैंप जंगलों के अंदर, नक्सल प्रभावती इलाके तक लगाते रहे हैं। नए कैंप बनेंगे तो बौखलाहट भी बढ़ेगी और चलती का विस्तार भी बढ़ेगा, लेकिन एक बार अगर जहां कैंप बन जाता है तो फिर वहां, सड़क, स्कूल या फिर बिजली पहुंचाने में कठिनाई नहीं होती है।

लंबे समय से आप नक्सलवाद प्रभावित इलाके में हैं, माओवाद की फिलॉसफी क्या है, इसमें कोई फर्क नहीं आया है?
माओवाद बैलेट नहीं गोलियों पर निर्भर करता है। ये पूंजीवाद को सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं। यह बस कहने के लिए गरीबों को न्याय दिलाने, बोगरी दिलाने की बात करते हैं। इनका देश के संविधान पर निर्भर नहीं होता है। ये लोग तो अपनी अलग जनता सरकार चलाते हैं। इनका यही सपना है कि एक दिन यह सरकार पूरे देश की सरकार होगी। शुरू से अब तक माओवादियों की यह फिलॉसफी जस की तसवीर है, लेकिन हां, अब सरकारी नीतियों की वजह से आत्मसमर्पण की संख्या में तेजी आई है।

नक्सलियों और जवानों की रणनीति में ऐसा क्या फर्क पड़ता है कि ये लोग जवानों को निशाना बनाने में कामयाब हो जाते हैं?
फोर्स भी नक्सलियों का खात्मा कर रही है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि कौन नक्सली है और कौन गांव वाला इसे समझना आसान नहीं है। दूसरी बात जो मैंने ऊपर कही ये लोग देश के संविधान को नहीं मानते हैं और हम संवैधानिक दायरे में बनेकर ही ऑपरेशन करते हैं। हम गांव वालों की आड़ में हमला नहीं करते और इनका सबसे बड़ा रक्षाकवच गांव वाले हैं।

5 मार्च को छत्तीसगढ़ में हुई बैठक में गृह मंत्री ने कहा कि इस लड़ाई को हम अंजाम तक ले जाएंगे, किसी बड़े अभियान की तैयारी है?
नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में अर्धसैनिक बल आगे बढ़ रहे हैं। हमारी रणनीति मजबूत हो रही है। नक्सलवाद के खिलाफ ऑपरेशन लगातार चल रहा है। पिछले चार-पांच साल में काफी दबाव बना है। हम उनके कब्जे से काफी इलाका मुक्त करने में सफल हुए हैं। हम लगातार अंदर धकेलते जा रहे हैं।

मैं अभी तक कह रहा हूं कि हम बिल्कुल ठीक रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऑपरेशन के दौरान नक्सली हमले का मतलब यह नहीं होता है कि सुरक्षाबल कमजोर और नक्सली मजबूत हो रहे हैं। नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन होगा तो नक्सली साथी तो होंगे ही। लेकिन हम लगातार अंदर तक घुसते जा रहे हैं।

कोरोना ने देश की आर्थिक व्यवस्था पर चोट की है, क्या नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई पर इसका असर पड़ा है?
नहीं, नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई पर इसका कोई असर नहीं हुआ है। हां, नक्सलियों को मिलने वाली मदद पर जरूर इसका असर हुआ, लेकिन अभी तक इसके क्वॉन्टिटेटिव असर को नापने के लिए कोई स्टडी नहीं हुई।

अभी नक्सलियों के कब्जे में एक जवान है, उसके बारे में कोई बात नहीं हुई?
अभी नक्सलियों ने हमें कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। हम कुछ पूर्व नक्सलियों और पत्रकारों के माध्यम से उनसे बातचीत करने का प्रयास कर रहे हैं।

नक्सली टेक्नोफ्रेंडली हैं, हथियार भी आधुनिक रखते हैं, ये सब मिलता है कहां से है?
प्रतियोगी नक्सली देखने में गरीब लग रहे हैं, लेकिन वे मदद पहुंचाने वालों का नेक्सस बड़ा है। सरकार उसे तोड़ रही है और हम यहां नक्सलियों से सीधी लड़ाई कर रहे हैं। हथियार तो यह सुरक्षाबलों से लूटपाट और हमले के दौरान पा जाते हैं।

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