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सरकार पर बड़ा आरोप: सरगुजा में खनन के लिए कलेक्टर ने ग्राम सभा की सहमति का प्रमाणपत्र लगाया है, अब सरपंचों ने कहा- ऐसे कोई ग्रामसभा कभी नहीं हुई।

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रायपुर16 मिनट पहले

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छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य क्षेत्र मुर्गा के सबसे बड़े भंडारों में से एक है। यह घने जंगल और हाथियों के बनेवास का इलाका है। स्थानीय आदिवासी यहां लंबे समय से खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

  • ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और केंद्रीय जनकार्य मंत्री को भेजी शिकायत
  • वन स्वीकृति निरस्त करने, मामले की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग ‘

छत्तीसगढ़ के सरगुजा स्थित हसदेव अरण्य स्थित परसा कोल ब्लॉक का मामला फिर गरमा सकता है। राजस्थान राज्य विद्युत निगम को आवंटित इस खदान में खनन शुरू कराने के लिए कलेक्टर ने ग्राम सभा की स्वीकृति का जो प्रमाण पत्र जारी किया है, उस पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि उनके यहां इस तरह की कोई ग्राम सभा ही नहीं हुई है, जिसमें वन भूमि के डाइवर्सन का प्रस्ताव हो। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, राज्यपाल उदयैया उइके और केंद्रीय जनकार्य कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा को पत्र लिखकर इसकी विस्तृत शिकायत की है।

अपने पत्र में ग्रामीणों ने कहा है, परसा कोलहाउसक के लिए वन भूमि के डायवर्सन या खनन की सहमति को हमारी ग्राम सभा ने कभी सहमति नहीं दी है। कलेक्टर ने जिस तारीख को ग्राम सभा का प्रस्ताव स्वीकृत होना दर्शाया है उस तारीख में गांव में किसी ग्राम सभा का आयोजन नहीं हुआ है। ग्रामीणों ने कहा, कलेक्टर ने तो यह भी प्रमाण पत्र जारी कर दिया है कि खनन के लिए प्रस्तावित वन भूमि पर वनाधिकारों के लंगरहांकन और निर्धारण की प्रक्रिया पूर्ण कर ली गई है।

ग्रामीणों ने कहा कि वास्तविकता यह है कि उस वन भूमि पर आज भी हमारी वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया लंबित है। वर्ष 2016-17 के लंबित और वर्ष 2020 में जमा नए व्यक्तिगत वनाधिकार के दावों के सत्यापन और मान्यता की कार्यवाही अभी भी जारी है। हमारे गांव के सामुदायिक वन संसाधन के अधिकारों की भी आज की तारीख तक मान्यता नहीं मिली है। इस पत्र में खनन से प्रभावित गांवों साल्ही और घटबर्रा के सरपंचों, ग्राम फत्तेपुर के वन अधिकार समिति के अध्यक्ष सहित तीनों गांवों के 282 लोगों के हस्ताक्षर हैं।

लंबे समय से विरोध प्रदर्शन चल रहा है

हसदेव अरण्य क्षेत्र के गांवों में खनन परियोजनाओं का विरोध लंबे समय से चल रहा है। वर्ष 2014 से कई बार ग्राम साबो ने खनन परियोजनाओ के प्रत्येक चरण का विरोध किया है। केंद्र और राज्य सरकारों को शिकायतें भेजने के साथ स्थानीय आदिवासी आंदोलन भी कर चुके हैं। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

बैलाडीला में ग्राम सभा को फर्जी पाया गया था

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में ग्राम सभाओं के फर्जी प्रस्ताव तैयार कर उन्हीं के आधार पर खनन और वन भूमि डायवर्सन की स्वीकृति ली गई। इससे आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल से। मौजूदा कांग्रेस सरकार ऐसे मामलों की जांच और कार्रवाई न करके पीछे गैर कानूनी कामों को मान्यता दे रही है।

शुक्ला कहते हैं, बस्तर के बैलाडीला स्थित 13 नंबर डिपोजिट की वन स्वीकृति के लिए ग्राम सभा के प्रस्ताव की जांच में वह फर्जी पाया गया है। कलेक्टर ने न सिर्फ पूरी प्रक्रिया को शून्य माना, बल्कि परियोजना के लिए जारी वन स्वीकृति के अंतिम आदेश को निरस्त करने की अनुशंसा भी की। अब एक साल बाद भी राज्य सरकार ने कलेक्टर की उस सिफारिश पर कार्यवाही नहीं की है।

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