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छत्तीसगढ़ में अंध विश्वास के कारण नहीं मनाते होली: खरहरी गाँव के बच्चों को नहीं पता होली क्या है, न रंग खेला न चित्रमय देखा; 100 साल से त्योहार नहीं मनाते हैं

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  • खारी गाँव के बच्चे नहीं जानते कि होली क्या है, न तो उन्होंने खेला है और न ही उन्होंने त्योहार मनाया है; 100 साल तक नहीं मनाया गया त्योहार

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रायपुरएक घंटा पहलेलेखक: संदीप राजवाल

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100 साल से ज्यादा समय से अंध विश्वास के कारण खरहरी गांव के लोग होली नहीं मनाते। ग्रामीणों का मानना ​​है कि अगर गांव में रंग खेला जाता है तो बीमारी फैल जाएगी और झाड़ू फैल जाएगी।

  • ग्रामीण मानते हैं कि रंगों से होली खेली तो फैल जाएगी बीमारी, झाड़ की तो आग फैल जाएगी

होली के नाम सुनते ही रंग-गुलाल, पिचकारी और फाग-गीत आँखों के सामने दिखाई देने लगते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में कोरबा जिले के खरहरी गांव में ऐसा कुछ नहीं होता है। यहां के बच्चों को दीवाली, रक्षा बंधन, नवरात्रि-दशहरा तो धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन होली क्या है, उन्हें पता नहीं है। यहां के 8 से 10 साल तक के बच्चों ने न कभी रंग-गुलाल से होली खेली और न ही पिचकारी चलाई।

इतना ही नहीं, इस गांव में रहने वाली तीन पीढ़ियों के लोगों का यही हाल है। इस गांव में न तो होलिका दहन होता है और न ही अगले दिन रंग खेलते हैं। न नाच न फाग गीत। 100 साल से ज्यादा समय से अंध विश्वास के कारण यहां मनाते नहीं हैं। गांववालों का मानना ​​है कि अगर गांव में रंग खेला गया तो बीमारी या महामारी फैल जाएगी। होलिका विभाजन करने पर गांव में आग लग जाएगी।

इस धारणा से ही यहां के लोगों के जीवन से होली त्योहार पूरी तरह से गायब है। जब भास्कर टीम खरहरी गांव पहुंची तो 65-70 साल के बुजुर्ग से लेकर युवा और बाल घरों के सामने बैठे थे, बच्चों ने खेल दिखाये। सबसे उम्र के 70 साल के मेहतर सिंह कंवर बताते हैं कि उनके पैदा होने के पहले से यहां होली नहीं खेल रहे हैं। उन्होंने बचपन में देखा-सुना था कि गांव के व्यक्ति ने होली मनाई तो उसके शरीर में बड़े-बड़े दाने आ गए, ऐसा पहले भी हो चुका है। इसलिए कोई भी खेल नहीं है।

इसी कारण गांव की दुकानों में भी न गुलाल-रंग बिकता है और न ही पिचकारी लटकी हुई दिखाई देती हैं। छत्तीसगढ़ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ। दिनेश मिश्रा ने बताया कि ग्रामीण सिर्फ अंधविश्वास के कारण ऐसी परंपरा निभा रहे हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए समिति गांव जाएगी और होली के बारे में बताकर जागरूक करेगी।

गांव में शादी करके आई बहुओं ने भी कभी खेल नहीं होली

गांव में शादी करके बहू बनकर आई 28 साल की फूलेश्वरी बाई यादव ने बताया कि अपने गांव में शादी के पहले तक होली में रंग खेलती थी। लेकिन यहां शादी के बाद से ही होली नहीं मनाई जाती है। दूसरी जगह ब्याही गई बेटियाँ वहाँ होली खेलती हैं। लेकिन यहाँ आकर उस दिन खेल नहीं हो सकता। हालांकि, त्योहार वाले दिन घरों में छल बनते हैं।

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